Alfaaz...
सोचा की कुछ लिखु, कुछ खुबसूरत अल्फ़ाज़ों के अनमोल मोतियों को, एक धागे में पिरोयुं, सुना है की इन मोतियों का आज के जमाने में खेल बड़ा ही निराला है, ये जिनकी जुबान से सच बनके गिरते हैं, उनसे सब कुछ छीनलेते हैं, और जिनकी जुबान से झूठ बनके गिरते हैं, उन्हें छप्पड़ फाड़कर देते हैं, ये तो अपने समझने समझने की बात है, इसमें हम इन अल्फाजों को क्यूँ कसूरवार थराएं, इन्ही की बदोलत आज मैं दो वक़्त का खाना चैन से खा रहा हु, और अपनी सोच को इन्ही मोतियों के हवाले से आप तक पहुंचा रहा हु, खेर धागे में पिरोते पिरोते मैंने पाया की, ये एक अफवाह भी बने और कहावत भी, खबर भी बने और खुबसूरत नगमा भी, झगडा भी बने और प्रतिज्ञा भी, आदेश भी बने और आखिर में मेरा सन्देश...