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अब नहीं तनहा...

अभी अभी रास्ते के किनारे मेरी दांयी तरफ , बनकर तैयार हुई   है एक जवाँ बैठक आज! काफी दिन से मैं अकेली मुसाफिर का सहारा बनी हुई थी , तनहा यहाँ खड़ी खड़ी बूढी हो रही थी!! ज़ेहन में सिर्फ यही था , कि एक दिन   मेरी हड्डियों का सीमेंट कमज़ोर पड़ जाएगा , और मैं बिना किसी अपने से बात कर , बिना किसी अपने से मिल इस जगह से विदा हो जाउंगी !!! लेकिन खुदा ने मुझ निर्जीव को सुना और मेरी वारिस बना भेजी , आखिर तन्हाई में सहारा तो मिला !!! करुँगी, जंवा बैठक को इस जगह से वाकिफ़ , कि कैसे ,  पास वाले मोहल्ले   से कुछ बच्चे आ जाते ,  मेरी गोद में कूदते , खेलते , तो कभी मुझे पथ्थर से भी मारते ,  लेकिन मुस्कुराते हुए सब   सह लेती !!! सुबह सवेरे टहलते मुसाफिरों के घर कि दास्तान सुन लेती !! सास बहु कि तकरार भरी   बाते , तो कभी मुझ पर बैठे   प्रेमी जोड़ों कि मोहब्बत भी सुन लेती!!! ...

शायर से कहती सड़क...

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बेठा था शायर अपनी ही दुनिया में डूबा  मैखाने में जैसे शराबियों का कुनबा!! अपने अल्फ़ाज़ों में उलझा सा था  छत पर जैसे पतंग कट जाने के बाद माँजा!! तभी उससे बगल में चलती सड़क ने पूछा  क्या मेरी इतनी भी अहमियत नहीं, कि कोई शायर मुझे अपने लफ़्ज़ों कि चादर उड़ा सके, मुझे बयान कर सके!!   कैसे मेरे सीने पर से होकर लोग अपनी मंज़िल तक पहुँचते हैं!! हर पल मुझे चीरती हुई    बच्चों कि तरह ये गाड़िया मुझपर दौड़ती !! मेरी पीठ पर बेठ न जाने कहाँ कहाँ का सफ्फर  तय करते हो, सब थक कर अपने आशियाने में आराम फरमाते हैं मैं भी थक जाती हूँ अपनी पीठ पर इतना सब लादे, क्या मुझे ठहराव नहीं मिल सकता मुझे आराम नहीं मिल सकता, एक रात मैं भी ठहर जायूं, जहाँ कोई भी न हो, कोई भी..!!   इतना सुन,  शायर लफ़्ज़ों के दरिया से बाहर निकला रात के अँधेरे में से जैसे दिन का उजाला!! एक नज़र सड़क को देख  लबों पर मुस्कान लिए, दबी आवाज़ में ये कह, उसकी पीठ पर बैठ आगे बढ़ च...