अब नहीं तनहा...
अभी अभी रास्ते के किनारे
मेरी दांयी तरफ, बनकर तैयार हुई
है एक जवाँ बैठक आज!
काफी दिन से मैं अकेली
मुसाफिर का सहारा बनी हुई थी,
तनहा यहाँ खड़ी खड़ी बूढी हो रही थी!!
ज़ेहन में सिर्फ यही था, कि एक दिन
मेरी हड्डियों का सीमेंट कमज़ोर पड़ जाएगा,
और मैं बिना किसी अपने से बात कर,
बिना किसी अपने से मिल
इस जगह से विदा हो जाउंगी!!!
लेकिन खुदा ने मुझ निर्जीव को सुना
और मेरी वारिस बना भेजी,
आखिर तन्हाई में सहारा तो मिला!!!
करुँगी, जंवा बैठक को इस जगह से वाकिफ़,
कि कैसे,
पास वाले मोहल्ले से कुछ बच्चे आ जाते,
मेरी गोद में कूदते,खेलते,
तो कभी मुझे पथ्थर से भी मारते,
लेकिन मुस्कुराते हुए सब सह लेती!!!
सुबह सवेरे टहलते मुसाफिरों के
घर कि दास्तान सुन लेती!!
सास बहु कि तकरार भरी बाते,
तो कभी मुझ पर बैठे
प्रेमी जोड़ों कि मोहब्बत भी सुन लेती!!!
अपने गुज़रे लहमो से कराऊंगी इसे रु बा रु,
क्यूंकि,
चार-चार ईंटों से बने मेरे पैर
अब नहीं झेल पाते राहगीरों का भार,
पचास साल से चला आ रहा मेरा ये सफ्फर
करदूंगी सब, अब इसके हवाले!!!
अभी अभी रास्ते के किनारे
मेरी दांयी तरफ, बनकर तैयार हुई
है एक जंवा बैठक आज।
* बैठक- Bench
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