MaIn AdHuRa Hu....
मैं कहाँ से पूरा हूँ,
जिनके साथ हस्ता, पड़ता, खेलता,
रोता,
आज उन सब के बिना,
मैं अधूरा हूँ
छत की जिस मुंडेर पर बैठकर,
उड़ते पंछियों को ताकता, जिस पर
ऊंचा पाता, दोस्तों को पुकारता,
आज उस मुंडेर के बिना,
मैं अधूरा हूँ
सुबह सुबह प्रयेर से पहले
स्कूल में होने वाली मस्ती,
फिर इंटरवल का इंतज़ार और वो
छुट्टी में बजने वाली घंटी की आवाज़,
आज उस आवाज़ के बिना,
मैं अधूरा हूँ
बरसात में खेलने की मस्ती,
बहार मिटटी में बहते
पानी में कागज़ की कश्ती
वो खुबसूरत नज़ारा,
आज उस नज़ारे के बिना
मैं अधूरा हूँ
कहाँ फस गया समझदारी के
इस भंवर में
वो खेलता कूदता नादान बचपन
ही प्यारा था,
आज उस बचपन के बिना
मैं अधूरा हूँ....!!

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