लाल अटेची। Part 2
इस तरह हम बिंदिया से एक बार फिर वादा कर वहाँ से बड़े शहर के लिए रवाना हो गए, कि जब हम लेटेंगे तो तुम हमारे हाथ में अपने लिए लाल अटेची जरूर देखोगी ! इतना सुन बिंदिया के होठों पर एक मीठी सी मुस्कान थी लेकिन आँखों में एक सवाल भी, क्या वाकई हम उसके लिए उसकी अटेची लेकर लौटेंगे या नहीं ! थोडा हम इस्लिये भी उदास थे कि परिवार के साथ साथ कंचों से भी दूर हो रहे थे ! दिल्ली शहर चुना था हमने जाने के लिए, वो इस्लिये कि वहाँ हमारे एक दो मित्र पहले से डेरा जमाये बेठे थे और दूसरा वहाँ हर किसी के लिए, हर तरह का काम भी था ! दिल्ली तक के सफ्फर में हमने न जाने कितने राहगीरों के पास लाल रंग कि अटेची देखि थी, यहाँ तक कि हमने अपनी साथ वाली सीट पर बेठे एक अंकल से पूछ ही लिया, क्या ये अटेची आपकी है? करीब कितने कि होगी यह? इस पर उन अंकल ने जिस तरह से हमे घूरा था उससे तो यह ही प्रतीत हुआ कि या तो हम उन्हें ना समझ दिखायी पड़े होंगे या उनके मन में चोर कि शंका पै...