लाल अटेची...! (Part 1)

ये बात उस दशक कि है, जब 10वीं पास होने के बाद आपके लिए सरकारी नौकरी के दरवाजे खुल जाते थे ! लेकिन हमारे लिए ये भी थोडा मुश्किल हो चला था !!

वैसे तो हम दसवीं कि परीक्षा में तीसरी बार बढ़ - चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे, लेकिन सवालों के उत्तर देने के मामले में हम पहली बार से भी पीछे रह गए थे ! वो उस परीक्षा का आखिरी पेपर भी था ! करीब दो घंटे गुज़र चुके थे और हमने एग्जाम कॉपी पर लफ़्ज़ों में सिर्फ "उत्तर" ही लिखा था, पूरा उत्तर किस प्रश्न का लिखें, ये मालूम नहीं था ! 

मालूम भी कैसे होता हमारा पूरा वक़्त या तो दोस्तों के साथ खेत में कंचे खेलने में बीत जाता या ये सोचने में गुज़र जाता कि आख़िर कार छोटी बहन बिंदिया को लाल अटेची कहाँ से लाकर दें। इस बार तो 
हम बिंदिया से वादा भी किये थे, कि इस दफा परीक्षा में जरूर पास होंगे जिसके बाद हमे एक अच्छी नौकरी मिल सकेगी और फिर तुम्हारे लिए एक लाल अटेची ला देंगे। 
 
और उस वादे कि ही वजह से हमारी ललचायी आँखें उस समय दायीं और बायीं तरफ बेठे कालू और चेतन कि कॉपी निहारने में पूरी तरह से व्यस्त थी, कि कैसे भी कहीं से भी उत्तर देखने को मिल जाये… पर जब कहीं से कुछ मदद नहीं मिली तो हमे याद आया सतीश का नाम, जो ठीक हमारे आगे बेठा था, हमारे ही मोहल्ले का था,एक बार हम उसका सफ़ेद कंचा जीत लिए थे,उस दिन से वो हम से खफा खफा रहता था, फिर भी हमने धीमे से कहा.…  

"श्शश सतीश सुनो, जरा बताओ न यार, एइसा करो आखिरी सवाल का जवाब ही बतादो, थोडा सा टिपवा दो बे" सतीश झिल्लते हुए धीमे से बोला, अबे कितना टीपोगे बे, टीप टीप के कतई टीपू सुलतान बन गए हो तुम, और आखिरी सवाल पर तुम कैसे पहुँच गए… ! नहीं नहीं हम नहीं पहुंचे, वो तो हम तुम्हारी सहूलियत के लिए कह रहे हैं, ताकि तुम्हे कोई और जवाब दिखाने के लिए पन्ना नहीं पलटना पड़े और तुम्हारा समय बर्बाद न हो ! 

चुप रहो अगर मास्टरजी देख लिए तो हमारा ऐसा समय बर्बाद होगा कि अगले साल हमे भी तुम्हरे साथ बैठना पड़ जायेगा !  और इस तरह लाख कोशिशों के बाद भी हम अपने प्रशपत्र के किसी भी सवाल का उत्तर लिखने में नाकामयाब रहे थे!  तभी एक सख्त आवाज़ आयी जो वहाँ पहरा दे रहे गुरु जी कि थी।  सिर्फ पांच मिनट बचे हैं जल्दी सें अपने सभी उत्तरों पर एक बार फिर नज़र दाल लें। 

हमारे पास नज़र डालने के लिए तो कोई उत्तर नहीं था, पर कपी जमा करने से पहले हमने चंद लाइन लिखना मुनासिब समझा "मास्टरजी हमे छमा करें ३ साल कि मशहककत के बाद भी हम इन् सवालो के जवाब खोजने में असफल रह गए हैं,कम्बखत हमारी बुद्धि हमारा साथ नहीं देती। हमारा नाम डमरू है, काफी गरीब हैं हम, घर पर १३ वर्षीय छोटी बहन है, जो हमसे, उसकी शादी पर एक लाल अटैची देने कि जिद्द करती है, ताकि वो उसमे अपनी सभी यादें बंद कर अपने संग ले जाये और माँ है जो लोगों के झूठे बर्तन माज थोडा सा पैसा कमा लेती है ! पिताजी का देहांत काफी पहले ही हो चूका है, कृपया कर हमे इस बार जरूर पास कर दें ताकि हम अपने जीवन में कहीं नौकरी कर सकें और अपनी बहन के लिए लाल अटेची जरूर खरीद सकें'!
 
लेकिन हमारी कॉपी जांचने वाले अध्यापक को हमारी उन पंक्तियों पर बिल्कुल भी तरस नहीं आया था और एक दिन अखबार के जरिये हमे ये पैगाम भी मिला गया था कि हमे अगले वर्ष भी दसवी कि परीक्षा देनी होगी।  
ये देख हमे अपनी बहन का मासूम हसमुख चहरा याद आ गया, जिस पर अब उदासीन काले बादल छाए हुए थे ! हमे पहली बार इतना दुःख हो रहा था, क्यूंकि हम जानते थे कि अब हमे कोई अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी और ना ही हम अपनी बहन के लिए लाल अटेची खरीद पाएंगे। अब क्या करें,बिंदिया को क्या कहेंगे, इसी सोच में डूबे घर कि ओरे हमने कदम बड़ा दिए !

बढ़ते कदमो के साथ घर का धुन्दला दरवाजा साफ़ नज़र आने लगा था और नज़र आने लगी थी दरवाजे पर खड़ी हमारी छोटी बहन बिंदिया, जो आँखों में चमक लिए हमारा इंतज़ार शायद तभी से वहाँ खड़े होकर कर रही थी, जब हम अपना परिणाम जान्ने के लिए घर से निकले थे । भैया आ गए आप, कैसा रहा परिणाम, पास हो गए न, अब तो आपकी नौकरी लग जायेगी न, हमारे लिए आप लाल अटेची ला देंगे न? बताओ न भैया ! 

मासूम आवाज़ में इतने सारे सवाल पूछ डाले थे बिंदिया ने ! लेकिन इन सब सवाल का जवाब सिर्फ एक लफ्ज़ में हमने "नहीं" में दिया था ! इतना सुनते ही बिंदिया कि छोटे छोटे नैनो सें पानी कि बूंदे छलकने लगी थी,पलकें उन् बूंदो में भीग गयीं थी और उसने भरे गले से पूछा,भैया क्या हमे हमारी लाल अटेची कभी नहीं मिलेगी ! उसकी भरी आँखों और उस मासूम सवाल ने हमारी आँखें भी भर दी थी। 

अरे पागल, रोती क्यूँ है ! क्या हुआ तो हम परीक्षा में पास नहीं हुए, इसका मतलब ये थोड़े ही नहीं हुआ कि हम तुम्हारे लिए तुम्हरी अटेची नहीं खरीद पाएंगे, तब तक हमारी माँ भी पड़ोस के घर से आ गयी थी।
क्यूँ उससे झूठे वादे करते हो जब निभा ही नहीं सकते ! हमे नहीं लगता कि तुम कभी पास हो पाओगे, छोडो अब ये पढ़ाई लिखाई और कुछ काम धाम करना शुरू करो, बिंदिया कि शादी भी करनी है, दहेज़ भी देना होगा, आज कल के लड़के वाले लड़की को बाद में देखते हैं पहले कम्बख़त दहेज़ के बारे में पूछते हैं, कितना दोगे। अब कहाँ से लायेंगे इतना पैसा ! हमारी माँ ने थोडा गगुस्से में कहा था और थोडा फिक्रमंद होकर भी !

माँ ये तो हम भी समझ गए कि परीक्षा में पास होना हमारे बस कि बात नहीं, इस्लिये हम आज फैसला किये हैं कि इस कसबे को छोड़ हम किसी बड़े शहर में जाकर कोई छोटा मोटा काम पकड़ लेंगे, पैसा कमाएंगे, और उनसे सबसे पहले बिंदिया को लाल अटेची खरीदेंगे और साथ ही उसकी शादी के लिए भी पैसा जमा कर लेंगे !
 
Continue... 

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