लाल अटेची। Part 2
इस तरह हम बिंदिया से एक बार फिर वादा कर वहाँ से बड़े शहर के लिए रवाना हो गए, कि जब हम लेटेंगे तो तुम हमारे हाथ में अपने लिए लाल अटेची जरूर देखोगी ! इतना सुन बिंदिया के होठों पर एक मीठी सी मुस्कान थी लेकिन आँखों में एक सवाल भी, क्या वाकई हम उसके लिए उसकी अटेची लेकर लौटेंगे या नहीं ! थोडा हम इस्लिये भी उदास थे कि परिवार के साथ साथ कंचों से भी दूर हो रहे थे !
दिल्ली शहर चुना था हमने जाने के लिए, वो इस्लिये कि वहाँ हमारे एक दो मित्र पहले से डेरा जमाये बेठे थे और दूसरा वहाँ हर किसी के लिए, हर तरह का काम भी था !
दिल्ली तक के सफ्फर में हमने न जाने कितने राहगीरों के पास लाल रंग कि अटेची देखि थी, यहाँ तक कि हमने अपनी साथ वाली सीट पर बेठे एक अंकल से पूछ ही लिया, क्या ये अटेची आपकी है? करीब कितने कि होगी यह? इस पर उन अंकल ने जिस तरह से हमे घूरा था उससे तो यह ही प्रतीत हुआ कि या तो हम उन्हें ना समझ दिखायी पड़े होंगे या उनके मन में चोर कि शंका पैदा हुई होगी, शायद तभी उन्होंने बिना कोई जवाब दिए वो अटेची अपने उप्पर पैरों पर रखली थी ! अब उम्र तो हमारी ज्यादा थी नहीं और कपडे भी कुछ खास नहीं पहने थे। तो अंकल का ऐसा कुछ समझना लाज़मी भी था !
खेर हम मन ही मन खुश हो रहे थे, बस एक बार दिल्ली पहुँच जाएँ तो कुछ दिनों बाद हमारे पास भी ऐसी अटेची खरीदने लायक पैसा होगा।
दिल्ली उतरे तो हमारे होश उड़ गए ! इतना बड़ा शहर पहले हम कभी नहीं देखे थे ! चौड़ी चौड़ी सड़कें, लम्बी लम्बी इमारते,रिक्शों से ज्यादा कारें,सड़क पर भीड़ से खचा खच भरी बसें देख हुमे लगा कि किसी और ही दुनिया में आ गये हैं और ख़ुशी भी हुई कि इतने बड़े शहर में कोई न कोई नौकरी तो आराम से मिल ही जायेगी !
अच्छा हुआ था हम अपने दोस्तों का पता उनके घर से लेकर निकले थे, जिसकी मदद से हम अपने दोस्त कि जहग पहुँच गए ! एक ही कमरा था, जिसमे करीब 6-7 लोग रहे होंगे ! ज़मीन पर बिस्तर बिछे थे, सुबह का समय था इस्लिये कमरे में थोड़ी अफरा तफरी मची थी.।
हाँ तो डमरू देखो ये दिल्ली बहुत बड़ी है, यहाँ तुम्हे सब कुछ अपने आप करना पड़ता है, हमारे दोस्त बंटी ने थोडा जोर देते हुए कहा था । हम समझ गए बंटी भाई, वैसे तुम यहाँ नौकरी क्या करते हो। देखो भाई यहाँ हम एक ढाबे पर काम करते हैं, अभी जायेंगे और कब वापस कमरे पर पहुंचेंगे,उसका कोई समय नहीं !
तो हमारी मदद करो न यार हमे भी नौकरी कि जरूरत है, छोटी बहन से वादा करके आये हैं कि लौटकर उसके लिए अटेची जरूर खरीद कर देंग ! यार सच्ची बताएं तो वहाँ अभी किसी लड़के कि जरूरत है नहीं। तुम थोडा निकलो दिल्ली में चांदनी चौक कि तरफ जाओ रेलवे स्टेशन कि तरफ वहाँ शायद काम बन जाये !
बंटी से हुई वार्तालाप से हमे ये समझ आ गया था कि यहाँ वो हमारी किसी तरह कि मदद नहीं करेगा, हमे ही अकेले अपनी मदद करनी पड़ेगी ! और हम अब अनजान शहर में,अंजनी सड़को पर अपनी बहन से किये वादे को पूरा करने के लिए निकल गए थे।
बंटी के मुताबिक़ पहले चांदनी चौक ही जाना बेहतरर समझा, वहाँ पहुँचने पर हमे लज़ीज़ परनाथे और कई तरह के व्यंजन कि दुकाने मिली, भूक भी काफी लगी थी, लेकिन पैसे इतने नहीं होने के कारण हमने दिन का खाना छोड़ना ही मुनासिब समझा।
खेर एक भोजनालय में हम काम मांगने पहुंचे? वहाँ हम कुछ कह पाते उससे पहले उन्होंने पूछ लिया मीठी आवाज़ में, क्या चाहिए खाने को? परांठे? पूरी सब्जी? दाल चावल, लस्सी या कुछ और? काम, काम चाहिए हमे, हमने जवाब दिया!
इतना सुनते ही आवाज़ में नीम के पत्तो कि तरह कड़वाहट आ गयी थी !
अच्छा, क्या आता है तुझे? आर्डर लेना आता है? खाने में क्या बना लेता है? ज़रा नाम बता ३-४ सब्जी के जल्दी जल्दी?
अब ये कुछ तो आता नहीं हमे ! पहली बार तो काम कर रहे हैं ! आप मौका देंगे तो जल्द ही सीख लेंगे !
चल भाग यहाँ से, बड़ा आया काम मांगने !
इस तरह चांदनी चौक में कई दुकानो पर जैसे कपडे, व्यंजन, खिलोने, किताबों कि दुकानो पर हमने काम माँगा तो कहीं से ये कहकर मना कर दिया, कि हमे उस काम का तजुरब्बा नहीं है तो किसी ने ये कह कर छुड़ा दिया, कि अभी उन्हें किसी कि जरूरत नहीं है।
पूरी तरह से टूट गए थे हम, अपने आपसे बातें किये जा रहे थे, इतना बेइज़ज़त तो हम कभी नहीं हुए, ३ साल फेल होने के बाद भी नहीं, बल्कि कंचे बाजी में तो सामान से देखा जाता है हमे, अदब से नाम लिया जाता है हमारा !
तभी हमारी नज़र वहाँ एक अटेची कि दूकान पर पड़ी, मुरझाया चहरा मुस्कुरा बेठा था, भूक उड़ गयी थी, क्यूंकि वहाँ हमे एक खूबसूरत सी लाल अटेची भी नज़र आ रही थी ! धीमे धीमे उस दूकान कि तरफ बड़े, पहली बार हम एक नयी खूबसूरत लाल अटेची के इतना नज़दीक पहुंचे थे, कुछ देर तक तो हम उसे घूरते रहे, फिर जैसे ही उसे छोने कि कोशिश कि, तभी एक बुलंद आवाज़ ने हमारे हाथ रोक लिए…क्या चाहिए तुझे? हमे यह अटेची चाहिए, कितने कि है? २०० रुपये कि। अच्छा, सम्भाल कर रखना ! आते हैं जरा पैसे जोड़ कर, पक्का खरीदेंगे ! (फिर धीमे से बबुदबुदाये, कब तक जोड़ पाएंगे ये हम नहीं जानते )
इतना कह कर हम, बंटी के बताये दुसरे विकल्प, रेलवे स्टेशन कि तरफ बड़ गए ! वहाँ भी हमारे साथ कुछ चांदनी चौक जैसा ही घठित हुआ ! लेकिन वहाँ हमारे लिए एक अच्छी बात हुई थी कि हमे रहने कि जगह मिल गयी थी ! किसी कमरे में नहीं, एक सवारी ट्रैन में, जो स्टेशन से कुछ दूर पर खड़ी होती थी !
इस तरह हमारे वहाँ दिन दर दिन गुजरने लगे थे और स्टेशन के बहार ही हमे एक भजनालय में नौकरी मिल गयी थी बर्तन माँजने कि, वहीँ खाने को मिल जाता था, और रात में सोने चले जाते थे !
पूरा शरीर दर्द करता था, कम्बखत रात को १ बजे छोड़ते थे और सुबह ७ बजे बुला लेते थे !
हम उस शरीर में होने वाले दर्द को किसी को नहीं बता सकते थे, हर रात सोते समय माँ और बिंदिया को याद कर लेते थे, सोचते अगर माँ होती तो थोडा सर दबा देती, मालिश कर देती, इस दर्द से छुटकारा मिल जाता, बिंदिया के साथ थोडा खेल लेते ! पल पल तड़पते थे माँ और बिंदिया कि याद में, हमे अपने कंचे याद आ जाते थे, कि अब उनसे कौन खेलता होगा, उन्हें भी तो हमारा इंतज़ार होगा !
हमारा यहाँ कोई साथी नहीं था,कोई दोस्त नहीं था, जो हमसे बात करता, जिसके साथ हम अपना दर्द बाँट ते ! ये सोचना शुरू कर दिया था कि पैसा हमे मिल नहीं रहा अच्छे से, पता नहीं हम इतना पैसा जोड़ भी पाएंगे कि बिंदिया को लाल अटेची खरीद सकेंगे ! और ये सब सोचते सोचते न जाने कब हमारे भीगे नैनो के साथ सपनो कि दुनिया में चले जाते !
ट्रैन से बहार सुबह ६ बजे निकलना होता था, क्यूंकि वो ट्रैन ७ बजे करीब वहाँ से स्टेशन कि तरफ निकल जाती थी !
एक दिन हम सुबह उठे तो देखा सामने सीट के नीचे एक लाल अटेची रखी थी ! ये देख हमने सोचा कहीं कोई सपना तो नहीं देखे रहे हैं, फिर खिड़की से बहार देखा तो दिन निकल आया था, आँखें मली और फिर देखे तो लाल अटेची वहीँ रखी थी !
फिर धीमे से उठे और उसे छुआ तो वो सच्ची में वहाँ थी, उसे छूने का एहसास ही बेहद खुशनुमा था ! हमने उस शानदार लाल अटेची को सीट के नीचे बड़े ही आहिस्ता से बहार निकाला !
उसका हैंडल पकड़ते ही, हमारी रात कि थकावट कहीं गुम हो गयी थी, शरीर का वो दर्द भी गायब हो गया था, चहरे पर मुस्कराहट थी और अंदर से बेहद उत्साहित थे हम!
उस अटेची बार बार उठाकर देख रहे थे, फिर उसे नीचे रख देते और फिर उठाते, अब और क्या चाहिए था हमे, मन ही मन बिंदिया को कह रहे थे, हमने अपना वादा पूरा किया, हमारे पास अब लाल रंग कि अटेची थी !
हमने अब अटेची छिपाने के लिए जल्द ही एक जगह ढूंडली थी, पटरियों से हटकर झाड़ियों के बीच में ! रोजाना जाते वक़्त हम वहीँ छिपाकर काम पर जाने लगे थे और लौट ते वक़्त वहाँ से ले लेते थे !
रात में आते तो उस अटेची से ही ढेर सारी बातें करतें, पूरे दिन का उसे हाल चाल सुनाते, उसके साथ कभी खेलते तो कभी उसे बिंदिया के बारे में बत्ताते कि बिंदिया तुम्हारे अंदर कैसे शादी के बाद घर कि सारी यादें समेत ले जायेगी ! और उससे प्रशन पूछते कि अभी तुम्हारे अंदर क्या क्या छिपा है ? तो कभी उसकी तारीफ करते तो कभी उसे अपना तकिया बना लेते और उस पर अपना सर रख सो जाते !
लेकिन अभी तो कुछ और भी मिलना बाकी था !!
काफी मशहक्कत के बावजूद हमे कहीं और कोई काम नहीं मिल रही था, सोचे कि अब घर लौट जाना ही बेहत्तर होगा ! जिस चीज के लिए आये थे, कम से कम वो तो हमे मिल ही गयी थी !
घर लौटने से ३-४ दिन पहले हमे भोजनालय में, एक फटा पेपर का टुकड़ा मिला, जिसमे लिखा था ' एक लाल रंग कि अटेची खो गयी है ! अगर किसी को भी कहीं मिले तो उसे इस पते पर पहुंचादे ! वो पता आगरा का था ! साथ ही लिखा था पहुंचाने वाले अच्छा इनाम दिया जायेगा, इनाम में रुपये दिए जायेंगे !"
हम समझ गए थे कि ये इसी अटेची के बारे में थी ! अब हम कैसे भी, किसी भी तरह उस अटेची को खोलना चाहते थे ! हम जानना चाहते थे कि उसके अंदर क्या था ! अब उस अटेची को खोलने कि हमारी जद्दोजहद शुरू हो चुकी थी, उसके लॉक में पत्त्थर मारकर, लोहे कि मार देकर, कुछ औजारों के बल से उसे खोलने में लग गए थे !
और हमे आखिरकार कामयाबी हासिल लगी थी ! वो खुल गयी थी, हमने उसके उप्पर वाला हिस्सा उठाया तो देखने को मिले छोटी सी बच्ची के बेहद खूबसूरत कपडे,प्यारे प्यारे खिलौने,और एक फ़ोटो जो उसी बच्ची कि लग रही थी जिसके वो कपडे और खिलौने थे !बेहद ही प्यारी थी वो फ़ोटो, इतनी प्यारी बच्ची मैंने नहीं देखि थी, बड़ी बड़ी काजल लगी आँखे थी, घुंगरालु बाल थे, गोल मटोल सी थी, फ़ोटो में इतनी प्यारी लग रही थी वो सच्ची में कितनी प्यारी होगी ! फ़ोटो पलट कर देखि, तो उसमे वही पता लिखा था जो उस पेपर में लिखा था !
सोचे इनाम में पैसे तो मिलेंगे ही, उनसे दूसरी अटेची खरीद लेंगे और जो बचेंगे वो बिंदिया कि शादी में काम आ जायेंगे, साथ ही उस बच्ची से भी मिल लेंगे !! और हम अगली शाम को आगरा पहुंचे और फिर उस पते पर !
काफी बड़ा घर था वो, हमने दरवाजा खटखटाया, कोई नहीं निकला ! फिर जोर से खटखताए आवाज़ के साथ कि कोई है ! अंदर से एक अंकल बहार निकले और उनके पीछे एक औंटी जी !
हाँ बेटा, बताओ क्या काम है !
अंकल हम अखबार में पड़े थे, ये लाल अटेची आपकी है !
लाल अटेची देखते ही अंकल मुस्कुरा बठे थे ! आंटी का चहरा खिल उठा था !
हाँ हाँ बेटा, हमारी ही है ! तुम्हे कहाँ से मिली !
वो अंकल ट्रैन मे........
तभी आंटी बोली, देखा कहा था न मैंने कि ट्रैन में ही रह गयी होगी ! अच्छा हुआ न आपने मेरी बात मान कर दिल्ली के पेपर में इसके बारे में निकलवा दिया था ! और इसके बाद आंटी अपनी बेटी के कपडे और खिलोने छू छू कर देखने लगी !! वो आपकी बेटी बड़ी ही प्यारी है, कहाँ है वो ! एक बार हम उसे देखना चाहते हैं !
आंटी और अंकल कि आँखों में पानी आ गया था ! अंकल ने कहा बेटा वो अब इस दुनिया में नहीं है ! गुड़िया नाम था उसका ! मुझसे जिद्द करती थी, पापा अटेचीचाहिए, मैं उसमे अपना सामान रखूंगी ! लेकिन, अटेची को छोड़ वो चली गयी ! ये अटेची हमारे लिए बहुत मायने रखती है ! कहीं जाते हैं तो इसे ले जाते हैं, लगता है हमारी बिटिया भी हमारे साथ ही है !!!
इतना सुनकर हमारी आखें भी भर आयीं थी ! वो दुःख कहीं ज्यादा बड़ा था ! तभी अंकल ने पूछा, बेटा बताओ क्या लोगे! हम पर ऐसान किया है तुमने ! अगर वहाँ हम कुछ मांगते तो हम खुदगर्ज़ होते, अगर नहीं मांगते तो बिंदिया से किया वादा एक बार फिर टूट जाता ! हमारे सूखे हलक से निकला, क्या एक गिलास पानी मिल जायेगा और बिना लाल अटेची के अधूरे वायदे के साथ वापस घर कि तरफ बढ़ गए !!
बस इतनी सी थी हमारी ये कहानी !!!
END
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