अभी अभी रास्ते के किनारे मेरी दांयी तरफ , बनकर तैयार हुई है एक जवाँ बैठक आज! काफी दिन से मैं अकेली मुसाफिर का सहारा बनी हुई थी , तनहा यहाँ खड़ी खड़ी बूढी हो रही थी!! ज़ेहन में सिर्फ यही था , कि एक दिन मेरी हड्डियों का सीमेंट कमज़ोर पड़ जाएगा , और मैं बिना किसी अपने से बात कर , बिना किसी अपने से मिल इस जगह से विदा हो जाउंगी !!! लेकिन खुदा ने मुझ निर्जीव को सुना और मेरी वारिस बना भेजी , आखिर तन्हाई में सहारा तो मिला !!! करुँगी, जंवा बैठक को इस जगह से वाकिफ़ , कि कैसे , पास वाले मोहल्ले से कुछ बच्चे आ जाते , मेरी गोद में कूदते , खेलते , तो कभी मुझे पथ्थर से भी मारते , लेकिन मुस्कुराते हुए सब सह लेती !!! सुबह सवेरे टहलते मुसाफिरों के घर कि दास्तान सुन लेती !! सास बहु कि तकरार भरी बाते , तो कभी मुझ पर बैठे प्रेमी जोड़ों कि मोहब्बत भी सुन लेती!!! ...