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लाल अटेची। Part 2

इस तरह हम बिंदिया से एक बार फिर वादा कर वहाँ से बड़े शहर के लिए रवाना हो गए, कि जब हम लेटेंगे तो तुम हमारे हाथ में अपने लिए  लाल   अटेची  जरूर देखोगी ! इतना सुन बिंदिया के होठों पर एक मीठी सी मुस्कान थी लेकिन आँखों में एक सवाल भी, क्या वाकई हम उसके लिए उसकी  अटेची  लेकर लौटेंगे या नहीं ! थोडा हम इस्लिये भी उदास थे कि परिवार के साथ साथ कंचों से भी दूर हो रहे थे ! दिल्ली शहर चुना था हमने जाने के लिए, वो इस्लिये कि वहाँ हमारे एक दो मित्र पहले से डेरा जमाये बेठे थे और दूसरा वहाँ हर किसी के लिए, हर तरह का काम भी था !  दिल्ली तक के सफ्फर में हमने न जाने कितने राहगीरों के पास  लाल  रंग कि  अटेची  देखि थी, यहाँ तक कि हमने अपनी साथ वाली सीट पर बेठे एक अंकल से पूछ ही लिया, क्या ये  अटेची  आपकी है? करीब कितने कि होगी यह? इस पर उन अंकल ने जिस तरह से हमे घूरा था उससे तो यह ही प्रतीत हुआ कि या तो हम उन्हें ना समझ दिखायी पड़े होंगे या उनके मन में चोर कि शंका पै...

लाल अटेची...! (Part 1)

ये बात उस दशक कि है, जब 10वीं पास होने के बाद आपके लिए सरकारी नौकरी के दरवाजे खुल जाते थे ! लेकिन हमारे लिए ये भी थोडा मुश्किल हो चला था !! वैसे तो हम दसवीं कि परीक्षा में तीसरी बार बढ़ - चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे, लेकिन सवालों के उत्तर देने के मामले में हम पहली बार से भी पीछे रह गए थे ! वो उस परीक्षा का आखिरी पेपर भी था ! करीब दो घंटे गुज़र चुके थे और हमने एग्जाम कॉपी पर लफ़्ज़ों में सिर्फ "उत्तर" ही लिखा था, पूरा उत्तर किस प्रश्न का लिखें, ये मालूम नहीं था !  मालूम भी कैसे होता हमारा पूरा वक़्त या तो दोस्तों के साथ खेत में कंचे खेलने में बीत जाता या ये सोचने में गुज़र जाता कि आख़िर कार छोटी बहन बिंदिया को लाल अटेची कहाँ से लाकर दें। इस बार तो  हम बिंदिया से वादा भी किये थे, कि इस दफा परीक्षा में जरूर पास होंगे जिसके बाद हमे एक अच्छी नौकरी मिल सकेगी और फिर तुम्हारे लिए एक लाल अटेची ला देंगे।    और उस ...

अब नहीं तनहा...

अभी अभी रास्ते के किनारे मेरी दांयी तरफ , बनकर तैयार हुई   है एक जवाँ बैठक आज! काफी दिन से मैं अकेली मुसाफिर का सहारा बनी हुई थी , तनहा यहाँ खड़ी खड़ी बूढी हो रही थी!! ज़ेहन में सिर्फ यही था , कि एक दिन   मेरी हड्डियों का सीमेंट कमज़ोर पड़ जाएगा , और मैं बिना किसी अपने से बात कर , बिना किसी अपने से मिल इस जगह से विदा हो जाउंगी !!! लेकिन खुदा ने मुझ निर्जीव को सुना और मेरी वारिस बना भेजी , आखिर तन्हाई में सहारा तो मिला !!! करुँगी, जंवा बैठक को इस जगह से वाकिफ़ , कि कैसे ,  पास वाले मोहल्ले   से कुछ बच्चे आ जाते ,  मेरी गोद में कूदते , खेलते , तो कभी मुझे पथ्थर से भी मारते ,  लेकिन मुस्कुराते हुए सब   सह लेती !!! सुबह सवेरे टहलते मुसाफिरों के घर कि दास्तान सुन लेती !! सास बहु कि तकरार भरी   बाते , तो कभी मुझ पर बैठे   प्रेमी जोड़ों कि मोहब्बत भी सुन लेती!!! ...

शायर से कहती सड़क...

चित्र
बेठा था शायर अपनी ही दुनिया में डूबा  मैखाने में जैसे शराबियों का कुनबा!! अपने अल्फ़ाज़ों में उलझा सा था  छत पर जैसे पतंग कट जाने के बाद माँजा!! तभी उससे बगल में चलती सड़क ने पूछा  क्या मेरी इतनी भी अहमियत नहीं, कि कोई शायर मुझे अपने लफ़्ज़ों कि चादर उड़ा सके, मुझे बयान कर सके!!   कैसे मेरे सीने पर से होकर लोग अपनी मंज़िल तक पहुँचते हैं!! हर पल मुझे चीरती हुई    बच्चों कि तरह ये गाड़िया मुझपर दौड़ती !! मेरी पीठ पर बेठ न जाने कहाँ कहाँ का सफ्फर  तय करते हो, सब थक कर अपने आशियाने में आराम फरमाते हैं मैं भी थक जाती हूँ अपनी पीठ पर इतना सब लादे, क्या मुझे ठहराव नहीं मिल सकता मुझे आराम नहीं मिल सकता, एक रात मैं भी ठहर जायूं, जहाँ कोई भी न हो, कोई भी..!!   इतना सुन,  शायर लफ़्ज़ों के दरिया से बाहर निकला रात के अँधेरे में से जैसे दिन का उजाला!! एक नज़र सड़क को देख  लबों पर मुस्कान लिए, दबी आवाज़ में ये कह, उसकी पीठ पर बैठ आगे बढ़ च...