जीना चाहती हूँ मैं...
जीना चाहती हूँ मैं, जीने दो
मुझे आज मुस्कुराने दो…
मोहब्बत में ही तो ज़िन्दगी का नशा,
दुआ ही तो बेंतेहा दर्द की दवा है...
मुझसे ही तो तेरा अस्तिव,
तुझसे ही तो ये जहाँ है।
मुझे आज कुछ कह जाने दो...
शबनम की डाली पर बैठकर
हवा के चंचल झोंको से गुफ्तगू करनी है...
शमा की मुस्कान से मिलकर
एक दिलकश अफ़साने से खुबसूरत दामिनी को मिलना है।
जीना चाहती हूँ मैं,
तकलीफों के दरिया, हैवानियत के समुन्द्र
तकलीफों के दरिया, हैवानियत के समुन्द्र
को इसी जन्म में अलविदा कह,
कहीं और जाना चाहती हूँ मैं।
कहीं और जाना चाहती हूँ मैं।
जाना चाहती हूँ मैं,जाने दो,
मुझे आज नए सफ्फर पर निकल जाने दो…
एक बार फिर बचप्पन की क्यारी में छुपकर
एक बार फिर बचप्पन की क्यारी में छुपकर
आँगन में पड़ी मिटटी को जीब से लगानी है,
माँ की डांट के फूलों के बगीछों से
फिर नादान ख़्वाबों के परिंदों पर बैठकर उड़ना है।
जीना चाहती हूँ मैं,जीने दो
मुझे आज कहीं और मुस्कुराने दो।।।।
awsumm bhai....
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