शायर से कहती सड़क...

बेठा था शायर अपनी ही दुनिया में डूबा 
मैखाने में जैसे शराबियों का कुनबा!!

अपने अल्फ़ाज़ों में उलझा सा था 
छत पर जैसे पतंग कट जाने के बाद माँजा!!

तभी उससे बगल में चलती सड़क ने पूछा 
क्या मेरी इतनी भी अहमियत नहीं, कि
कोई शायर मुझे अपने लफ़्ज़ों कि चादर उड़ा सके,
मुझे बयान कर सके!!

 
कैसे मेरे सीने पर से होकर
लोग अपनी मंज़िल तक पहुँचते हैं!!
हर पल मुझे चीरती हुई   
बच्चों कि तरह ये गाड़िया मुझपर दौड़ती !!

मेरी पीठ पर बेठ न जाने कहाँ कहाँ का सफ्फर 
तय करते हो,
सब थक कर अपने आशियाने में आराम फरमाते हैं
मैं भी थक जाती हूँ अपनी पीठ पर इतना सब लादे,
क्या मुझे ठहराव नहीं मिल सकता
मुझे आराम नहीं मिल सकता,
एक रात मैं भी ठहर जायूं,
जहाँ कोई भी न हो, कोई भी..!!

 
इतना सुन, 
शायर लफ़्ज़ों के दरिया से बाहर निकला
रात के अँधेरे में से जैसे दिन का उजाला!!
एक नज़र सड़क को देख 
लबों पर मुस्कान लिए,
दबी आवाज़ में ये कह,
उसकी पीठ पर बैठ आगे बढ़ चला.…।

 
गर तुम ठहर गयीं, तो 
एक बच्चे का अपनी माँ से,
एक आशिक का अपनी मोहब्बत से,
एक चेला का अपने गुरु से,
और 
एक ख्वाब का हकीकत से 
मिलने का ख्वाब अधूरा रह जायेगा!!

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