Zindagi hai kuch...

ज़िन्दगी है कुछ थमी थमी सी, सहमी सहमी सी,
एक छोर पर खड़े हैं अपने,
दुसरे छोर पर हैं सपने!!!
चलता हूँ उन सपनो की ओर तो,
राहें दिखती हैं कुछ अनजानी अनजानी सी, 
डरावनी डरावनी सी!!!

हर मोड़ पर सामना होता है रहा गुज़र मुसाफिरों से
कुछ के नाम याद रहजाते हैं और कुछ के लफ्ज़,
जो बनजाते हैं मेरे समय के साथी!!!

जब मंजिल दिखती है दूर,
तब कुछ देर के लिए छाओं से भी हो जाती है यारी!!!

सपने हैं कुछ उखड़े उखड़े  से, बिखरे बिखरे से,
शायद इस्सलिये इस जंगल में अपने आपको अकेला पाता हूँ,
ज़ंजीरो में जकड़ा सा महसूस पाता हूँ,
इस में भी जब चुभन का एहसास नहीं होता
तब ख़याल आता है,
ज़िन्दगी है कुछ थमी थमी सी, सहमी सहमी सी…!!!

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Har Ghadi...

तलाश...

MaIn AdHuRa Hu....